1895 में स्वामी जी ने राजयोग पर अपनी प्रसिद्व टीका मिस एस. टी. बाल्डो (बाद में सिस्टर हरिदासी) को बोलकर लिखाई और इसके साथ पांतजलि के दर्शन का भाष्य भी जोड़ दिया। यह पुस्तक इतनी पसन्द की गई कि कुछ ही सप्ताहांे में इसके तीन संस्करण प्रकाशित हुए।
उन्हें अपने इस कार्य द्वारा कितने ही शिष्य और सहायक मित्र प्राप्त हुए। पिछले एक-डेढ़ साल में उन्हें कठोर परिश्रम करना पड़ा। अतएव अपने कुछ चुने हुए शिष्यों को साथ लेकर उन्होंने कुछ
1895 में स्वामी जी ने राजयोग पर अपनी प्रसिद्व टीका मिस एस. टी. बाल्डो (बाद में सिस्टर हरिदासी) को बोलकर लिखाई और इसके साथ पांतजलि के दर्शन का भाष्य भी जोड़ दिया। यह पुस्तक इतनी पसन्द की गई कि कुछ ही सप्ताहांे में इसके तीन संस्करण प्रकाशित हुए।
उन्हें अपने इस कार्य द्वारा कितने ही शिष्य और सहायक मित्र प्राप्त हुए। पिछले एक-डेढ़ साल में उन्हें कठोर परिश्रम करना पड़ा। अतएव अपने कुछ चुने हुए शिष्यों को साथ लेकर उन्होंने कुछ