सुनने में व्यतीत किए थे-उस समय हम भी जगत् को भूल गए थे और जगत् को भुला देने के लिए कल्पना की चाहे जितनी उड़ानें भरे, अंत में उसे भौतिक जगत् ही में लौट आना पड़ता है। कुमारी बाल्डो आगे लिखती है:
‘स्वामी जी यद्यपि क्रीड़ाशील व कौतुकप्रिय थे और उल्लास के साथ परिहास करने में और बात का तुरंत जवाब देने में वे अभ्यस्त थे तो भी कभी एक मुहूर्त के लिए भी अपने जीवन के मूलमंत्र से लक्ष्यभ्रष्ट न होते थे। प्रत्येक चीज़ ही से वे बोलने
सुनने में व्यतीत किए थे-उस समय हम भी जगत् को भूल गए थे और जगत् को भुला देने के लिए कल्पना की चाहे जितनी उड़ानें भरे, अंत में उसे भौतिक जगत् ही में लौट आना पड़ता है। कुमारी बाल्डो आगे लिखती है:
‘स्वामी जी यद्यपि क्रीड़ाशील व कौतुकप्रिय थे और उल्लास के साथ परिहास करने में और बात का तुरंत जवाब देने में वे अभ्यस्त थे तो भी कभी एक मुहूर्त के लिए भी अपने जीवन के मूलमंत्र से लक्ष्यभ्रष्ट न होते थे। प्रत्येक चीज़ ही से वे बोलने