उसे दिखा देना तथा उसमें से मूल्यवान धर्म विषयक उपदेशों का आविष्कार करना न भूलते थे।’’
ये अमरिकी शिष्यगण जो जीवन जी रहे थे, उसकी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक लम्बी नहीं थी। उनका न अपना कोई मिथक (डलजीवसवह), न गम्भीर दार्शनिक चिंतन और न ही समृद्व उत्कृष्ट सांस्कृतिक परम्परा थी। उन्हें ले-देकर मार्कोपालो और कोलम्बस के यात्रा-वर्णन ही विरासत में मिले थे या फिर यूरोप से जो आया, ले लिया। यही कारण है कि अमेरिकी चिंतन उथला-छिछला है,
उसे दिखा देना तथा उसमें से मूल्यवान धर्म विषयक उपदेशों का आविष्कार करना न भूलते थे।’’
ये अमरिकी शिष्यगण जो जीवन जी रहे थे, उसकी आयु तीन सौ वर्ष से अधिक लम्बी नहीं थी। उनका न अपना कोई मिथक (डलजीवसवह), न गम्भीर दार्शनिक चिंतन और न ही समृद्व उत्कृष्ट सांस्कृतिक परम्परा थी। उन्हें ले-देकर मार्कोपालो और कोलम्बस के यात्रा-वर्णन ही विरासत में मिले थे या फिर यूरोप से जो आया, ले लिया। यही कारण है कि अमेरिकी चिंतन उथला-छिछला है,