नरेन्द्र को तरह-तरह के भय दिखाकर दूसरी जाति के हाथ का खाने से मना करते थे।
पर यह बात नरेन्द्र के मन में न बैठती। जाति-भेद उसके लिए एक पहेली बन गया। वह सोचता-एक व्यक्ति किसी दूसरे के हाथ का क्यों नहीं खाता? अगर कोई दूसरी जात-बिरादरी के हाथ का खा ले, तो उसका क्या होगा? क्या उसके सिर पर छत टूट पड़ेगी? क्या वह मर जाएगा?
अनेक जातियों के मुवक्किल मकदमों के सिलसिले में ‘दत्त भवन’ आते रहते थे। रिवाज के अनुसार बैठक-घर के एक
नरेन्द्र को तरह-तरह के भय दिखाकर दूसरी जाति के हाथ का खाने से मना करते थे।
पर यह बात नरेन्द्र के मन में न बैठती। जाति-भेद उसके लिए एक पहेली बन गया। वह सोचता-एक व्यक्ति किसी दूसरे के हाथ का क्यों नहीं खाता? अगर कोई दूसरी जात-बिरादरी के हाथ का खा ले, तो उसका क्या होगा? क्या उसके सिर पर छत टूट पड़ेगी? क्या वह मर जाएगा?
अनेक जातियों के मुवक्किल मकदमों के सिलसिले में ‘दत्त भवन’ आते रहते थे। रिवाज के अनुसार बैठक-घर के एक