कोने में उनके लिए चांदी-जड़ाऊ अलग-अलग हुक्के रखे रहते थे। एक दिन उक्त विचार मन में लिए नरेन्द्र बैठक-घर में गया। वहां कोई दूसरा नहीं था। नरेन्द्र ने एक-एक हुक्के को अपने होंठों से लगाकर गुड़गुड़ाया। यह देख उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि वह जैसा पहले था, वैसा ही बना रहा। उसमें कोई परिवर्तन तो हुआ नहीं। एकाएक विश्वनाथ बाबू उधर आ निकले और बेटे को इस स्थिति में देख उन्होंने पूछा, ‘‘अरे, यह क्या कर रहा है, बिले?’’ बेटे ने चट उत्तर दिया,
कोने में उनके लिए चांदी-जड़ाऊ अलग-अलग हुक्के रखे रहते थे। एक दिन उक्त विचार मन में लिए नरेन्द्र बैठक-घर में गया। वहां कोई दूसरा नहीं था। नरेन्द्र ने एक-एक हुक्के को अपने होंठों से लगाकर गुड़गुड़ाया। यह देख उसे बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि वह जैसा पहले था, वैसा ही बना रहा। उसमें कोई परिवर्तन तो हुआ नहीं। एकाएक विश्वनाथ बाबू उधर आ निकले और बेटे को इस स्थिति में देख उन्होंने पूछा, ‘‘अरे, यह क्या कर रहा है, बिले?’’ बेटे ने चट उत्तर दिया,