में है और ये एक के बाद एक आते हैं तथा मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति की क्रम से ये तीन भूमिकाएं हैं। प्रत्येक भूमिका आवश्यक है। यही सार-रूप से धर्म है। भारत के नाना प्रकार के जातीय आचार-व्यवहारों और धर्ममतों में वेदान्त के प्रयोग का नाम है ‘हिन्दू धर्म’ यूरोप की जातियां विचारों में उसकी पहली भूमिका अर्थात् द्वैत का प्रयोग है ‘ईसाई धर्म’ सेमिटिक (ैमउमजपब) जातियों में उसका प्रयोग है। ‘इस्लाम धर्म’, अद्वैतवाद ही अपनी योगानुभूति के आकार में हुआ ‘बौद्व धर्म’-इत्यादि,
में है और ये एक के बाद एक आते हैं तथा मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति की क्रम से ये तीन भूमिकाएं हैं। प्रत्येक भूमिका आवश्यक है। यही सार-रूप से धर्म है। भारत के नाना प्रकार के जातीय आचार-व्यवहारों और धर्ममतों में वेदान्त के प्रयोग का नाम है ‘हिन्दू धर्म’ यूरोप की जातियां विचारों में उसकी पहली भूमिका अर्थात् द्वैत का प्रयोग है ‘ईसाई धर्म’ सेमिटिक (ैमउमजपब) जातियों में उसका प्रयोग है। ‘इस्लाम धर्म’, अद्वैतवाद ही अपनी योगानुभूति के आकार में हुआ ‘बौद्व धर्म’-इत्यादि,