‘‘समग्र मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करते रहो। तुम एक संकीर्ण के अन्दर बंधे
रहकर अपने को ‘शुद्व’ हिन्दू समझने का जो गर्व करते हो, उसे छोड़ दो।’’
-विवेकानन्द
चार बरस का प्रवास समाप्त हुआ। 15 जनवरी, 1897 को विवेकानन्द कोलम्बो पहुंचे, तो लंका-निवासी भारतीयों ने कोलम्बो और पाम्बन में उनका भव्य स्वागत किया। फिर भारत की भूमि पर रामनाड, मदुरा मद्रास, कलकत्ता इत्यादि जहां भी गए उनका इसी तरह भ्व्य स्वागत हुआ। रामनाड अर्थात् रामेश्वरम् में उनका जो जुलूस निकाला,
‘‘समग्र मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करते रहो। तुम एक संकीर्ण के अन्दर बंधे
रहकर अपने को ‘शुद्व’ हिन्दू समझने का जो गर्व करते हो, उसे छोड़ दो।’’
-विवेकानन्द
चार बरस का प्रवास समाप्त हुआ। 15 जनवरी, 1897 को विवेकानन्द कोलम्बो पहुंचे, तो लंका-निवासी भारतीयों ने कोलम्बो और पाम्बन में उनका भव्य स्वागत किया। फिर भारत की भूमि पर रामनाड, मदुरा मद्रास, कलकत्ता इत्यादि जहां भी गए उनका इसी तरह भ्व्य स्वागत हुआ। रामनाड अर्थात् रामेश्वरम् में उनका जो जुलूस निकाला,