योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

प्राचीन रीति के अनुसार उन्हें सम्मान देने के लिए वहां का राजा उनके रथ में जुता। इस स्वागत-सम्मान से उनके मन में जो उछाल उत्पन्न हुआ, उसे अपनी चहेती बहन मेरी हेल के नाम 28 अप्रैल के पत्र में यों व्यक्त किया हैः

‘‘यह सारा देश मेरे स्वागत के लिए एक प्राण होकर उठ खड़ा हुआ। हर स्थान में हज़ारों-लाखों मनुष्यों ने जय-जयकार किया। राजाओं ने मेरी गाड़ी खींची, राजधानियों के मार्गों पर हर कहीं स्वागत द्वार बनाए गए, जिन पर शानदार आदर्श वाक्य अंकित थे आदि! आदि!’’


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प्राचीन रीति के अनुसार उन्हें सम्मान देने के लिए वहां का राजा उनके रथ में जुता। इस स्वागत-सम्मान से उनके मन में जो उछाल उत्पन्न हुआ, उसे अपनी चहेती बहन मेरी हेल के नाम 28 अप्रैल के पत्र में यों व्यक्त किया हैः

‘‘यह सारा देश मेरे स्वागत के लिए एक प्राण होकर उठ खड़ा हुआ। हर स्थान में हज़ारों-लाखों मनुष्यों ने जय-जयकार किया। राजाओं ने मेरी गाड़ी खींची, राजधानियों के मार्गों पर हर कहीं स्वागत द्वार बनाए गए, जिन पर शानदार आदर्श वाक्य अंकित थे आदि! आदि!’’


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