तो यह है कि ईसाई देशों में जितने लोग यहां आते हैं, वे सब
113 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
एक ही प्राचीन मूर्खतापूर्ण तर्क देते हैं कि ईसाई धनवान और शक्तिमान है और हिन्दू नहीं हैं, इसलिए ईसाई धर्म हिन्दू धर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इस पर हिन्दू उचित ही यह प्रत्युत्तर देते हैं कि यही कारण है जिससे हिन्दू मत धर्म कहला सकता है और ईसाई मत नहीं, इस पाश्विक संसार में अधर्म और धूर्तता ही फलती है, गुणवानों को तो दुःख भोगना पड़ता है।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 315-16)
तो यह है कि ईसाई देशों में जितने लोग यहां आते हैं, वे सब
113 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
एक ही प्राचीन मूर्खतापूर्ण तर्क देते हैं कि ईसाई धनवान और शक्तिमान है और हिन्दू नहीं हैं, इसलिए ईसाई धर्म हिन्दू धर्म की अपेक्षा श्रेष्ठ है। इस पर हिन्दू उचित ही यह प्रत्युत्तर देते हैं कि यही कारण है जिससे हिन्दू मत धर्म कहला सकता है और ईसाई मत नहीं, इस पाश्विक संसार में अधर्म और धूर्तता ही फलती है, गुणवानों को तो दुःख भोगना पड़ता है।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 315-16)