इसी संबंध में एक दूसरी घटना भी उल्लेखनीय है। विवेकानन्द जब कलकत्ता पहुंचे तो वहां अकाल पड़ा हुआ था। लोगों का ख्याल था कि उनके स्वागत पर खर्च न करके कुल पैसा दुर्भिक्ष-निवारण-फंड मंे चंदा दे दिया जाए। पर उन्होंने ऐसा न करके अपना जुलूस निकलवाना ही पसंद किया। बाद में जब एक शिष्य ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो स्वामी जी ने उत्तर दिया:
‘‘हां, मेरी इच्छा ही थी कि मेरे लिए खूब धूम-धाम हो। बात क्या है, जानता है। थोड़ी
इसी संबंध में एक दूसरी घटना भी उल्लेखनीय है। विवेकानन्द जब कलकत्ता पहुंचे तो वहां अकाल पड़ा हुआ था। लोगों का ख्याल था कि उनके स्वागत पर खर्च न करके कुल पैसा दुर्भिक्ष-निवारण-फंड मंे चंदा दे दिया जाए। पर उन्होंने ऐसा न करके अपना जुलूस निकलवाना ही पसंद किया। बाद में जब एक शिष्य ने पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया तो स्वामी जी ने उत्तर दिया:
‘‘हां, मेरी इच्छा ही थी कि मेरे लिए खूब धूम-धाम हो। बात क्या है, जानता है। थोड़ी