योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

तो दुभिक्र्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है?...’’ (वि.सा., अष्टम खंड, पृष्ठ 251)

देश का मंगल ही उनके सब कार्योंं में सर्वोपरि था। वे व्यक्ति निरपेक्ष होकर राष्ट्रमय बन गए थे और राष्ट्र की आत्मा को झंझोड़ना, जागृत करना ही उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था। 1900 में जब वे दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो 27 जनवरी को पेसांडेना के शेक्सपीयर क्लब में ‘मेरा जीवन तथा ध्येय’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था:

‘‘अपने स्वल्प ढंग से,


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तो दुभिक्र्ष आदि को दूर करना फिर कितनी देर की बात है?...’’ (वि.सा., अष्टम खंड, पृष्ठ 251)

देश का मंगल ही उनके सब कार्योंं में सर्वोपरि था। वे व्यक्ति निरपेक्ष होकर राष्ट्रमय बन गए थे और राष्ट्र की आत्मा को झंझोड़ना, जागृत करना ही उनके जीवन का एक मात्र उद्देश्य था। 1900 में जब वे दोबारा विदेश यात्रा पर गए तो 27 जनवरी को पेसांडेना के शेक्सपीयर क्लब में ‘मेरा जीवन तथा ध्येय’ विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा था:

‘‘अपने स्वल्प ढंग से,


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