हुई पड़ी एक विशाल इमारत के सदृश है। पहले देखने पर आशा की कोई किरण नहीं मिलती। वह एक विगत और भगनावशिष्ट राष्ट्र है। पर थोड़ा और रूको, रूककर देखो, जान पड़ेगा कि इनके परे कुछ और भी है।..’’ परे जो कुछ है, उसे देखने के लिए दरकार है, जीने के लिए संघर्ष करती आ रही जनता के प्रति सहानुभूति, इतिहास तथा परम्परा का सम्यक् ज्ञान और उस ज्ञान से उत्पन्न दूर दृष्टि! विवेकानन्द कहते चले गए:
‘‘अब भारत राजनीतिक शक्ति नहीं, आज वह दासता में
हुई पड़ी एक विशाल इमारत के सदृश है। पहले देखने पर आशा की कोई किरण नहीं मिलती। वह एक विगत और भगनावशिष्ट राष्ट्र है। पर थोड़ा और रूको, रूककर देखो, जान पड़ेगा कि इनके परे कुछ और भी है।..’’ परे जो कुछ है, उसे देखने के लिए दरकार है, जीने के लिए संघर्ष करती आ रही जनता के प्रति सहानुभूति, इतिहास तथा परम्परा का सम्यक् ज्ञान और उस ज्ञान से उत्पन्न दूर दृष्टि! विवेकानन्द कहते चले गए:
‘‘अब भारत राजनीतिक शक्ति नहीं, आज वह दासता में