बंधी हुई जाति है। अपने ही प्रशासन में भारतीयों की कोई आवाज़ नहीं, उनका कोई स्थान नहीं-वे हैं केवल तीस करोड़ गुलाम-और कुछ नहीं। भारतवासी की औसत आय डेढ़ रूपया प्रति मास है। अधिकांश जन-समुदाय की जीवनचर्या उपवासों की कहानी है, और ज़रा-सी आय कम होने पर लाखों काल-कवलित हो जाते हैं। छोटे-से अकाल का अर्थ है मृत्यु। इसलिए जब मेरी दृष्टि उस ओर जाती है तो मुझे दिखाई पड़ता है-नाश, असाध्य नाश।’’
‘‘फिर भी इस जाति की सजीवता, इस देश का
बंधी हुई जाति है। अपने ही प्रशासन में भारतीयों की कोई आवाज़ नहीं, उनका कोई स्थान नहीं-वे हैं केवल तीस करोड़ गुलाम-और कुछ नहीं। भारतवासी की औसत आय डेढ़ रूपया प्रति मास है। अधिकांश जन-समुदाय की जीवनचर्या उपवासों की कहानी है, और ज़रा-सी आय कम होने पर लाखों काल-कवलित हो जाते हैं। छोटे-से अकाल का अर्थ है मृत्यु। इसलिए जब मेरी दृष्टि उस ओर जाती है तो मुझे दिखाई पड़ता है-नाश, असाध्य नाश।’’
‘‘फिर भी इस जाति की सजीवता, इस देश का