सैन्य-शक्ति नहीं है, व्यावसायिक आधिपत्य भी नहीं है और न यांत्रिक शक्ति ही है वरन् धर्म-केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व है और उसी को हमें रखना भी है।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 35)
जिस प्रकार उन्होंने मूर्ति पूजा की सूक्ष्म व्याख्या की थी, उसी प्रकार इस राष्ट्रीय भावना की भी ऐसी सुन्दर और काव्यमय व्याख्या करना विवेकानन्द का ही काम था। श्रोताओं में राष्ट्रीय गौरव जगाने के लिए उन्होंने बात जारी रखी:
‘‘एक बात यहां पर ध्यान
सैन्य-शक्ति नहीं है, व्यावसायिक आधिपत्य भी नहीं है और न यांत्रिक शक्ति ही है वरन् धर्म-केवल धर्म ही हमारा सर्वस्व है और उसी को हमें रखना भी है।’’ (वि.सा., पंचम खंड, पृष्ठ 35)
जिस प्रकार उन्होंने मूर्ति पूजा की सूक्ष्म व्याख्या की थी, उसी प्रकार इस राष्ट्रीय भावना की भी ऐसी सुन्दर और काव्यमय व्याख्या करना विवेकानन्द का ही काम था। श्रोताओं में राष्ट्रीय गौरव जगाने के लिए उन्होंने बात जारी रखी:
‘‘एक बात यहां पर ध्यान