और पथभ्रष्ट हो गए हों और चाहे जितने भी पथभ्रष्ट होकर क्यों न गिर गए हों, परन्तु यह निश्चित है कि आज यदि हम अपने धर्म के लिए तत्परता से कार्य-संलग्न हो जाएं तो हम अपनी गौरव प्राप्त कर सकते हैं।’’ (वही, पृष्ठ 37)
इसी प्रकार जब वे लंदन की एक सभा में भारत के गौरव का बखान कर रहे थे तो किसी श्रोता ने पूछा, ‘‘भारत के हिन्दुओं ने क्या किया है? वे आज तक किसी जाति पर विजय प्राप्त नहीं कर सके।’’
116 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
और पथभ्रष्ट हो गए हों और चाहे जितने भी पथभ्रष्ट होकर क्यों न गिर गए हों, परन्तु यह निश्चित है कि आज यदि हम अपने धर्म के लिए तत्परता से कार्य-संलग्न हो जाएं तो हम अपनी गौरव प्राप्त कर सकते हैं।’’ (वही, पृष्ठ 37)
इसी प्रकार जब वे लंदन की एक सभा में भारत के गौरव का बखान कर रहे थे तो किसी श्रोता ने पूछा, ‘‘भारत के हिन्दुओं ने क्या किया है? वे आज तक किसी जाति पर विजय प्राप्त नहीं कर सके।’’
116 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द