सबको धर्म के माध्यम ही से समझ सकते हैं। जातीय जीवन-संगीत का मानो यही प्रधान स्वर है और उसी प्रधान स्वर के नष्ट होने की शंका हो रही थी। ऐसा लगता था, मानो हम लोग अपने जातीय जीवन के इस मूल भाव को हटाकर उसकी जगह दूसरा भाव स्थापित करने जा रहे थे, अपने जातीय जीवन के धर्म रूप मेरूदंड की जगह राजनीति का मेरूदंड स्थापित करने जा रहे थे, यदि इसमें हमें सफलता मिलती, तो इसका फल पूर्ण विनाश होता, परन्तु ऐसा होने वाला नहीं था। यही कारण
सबको धर्म के माध्यम ही से समझ सकते हैं। जातीय जीवन-संगीत का मानो यही प्रधान स्वर है और उसी प्रधान स्वर के नष्ट होने की शंका हो रही थी। ऐसा लगता था, मानो हम लोग अपने जातीय जीवन के इस मूल भाव को हटाकर उसकी जगह दूसरा भाव स्थापित करने जा रहे थे, अपने जातीय जीवन के धर्म रूप मेरूदंड की जगह राजनीति का मेरूदंड स्थापित करने जा रहे थे, यदि इसमें हमें सफलता मिलती, तो इसका फल पूर्ण विनाश होता, परन्तु ऐसा होने वाला नहीं था। यही कारण