समन्वय नहीं समझौता है और वे कहिए कि शान्तिमय अस्तित्व का ‘जिओ और जीने दो’ का सिद्वात है। पर विवेकानन्द ने आक्रामक रूख अपनाया और दूसरों का विश्व धर्म का दावा रद्द करके अपना दावा पेश किया। यह आक्रामक रूख उन्होंने धर्म महासभा ही में अख्तयार कर लिया था और अख्तयार कर लेना आवश्यक तथा अनिवार्य भी था क्योंकि नव-जागरण की तरंग ने उन्हें ज़बरदस्ती वहां फेंका था और उन्हें धर्म के माध्यम से राजनीति की लड़ाई लड़नी थी। इस सिलसिले में उनका मस्तिष्क साफ था। वे स्वयं कहते हैं,
समन्वय नहीं समझौता है और वे कहिए कि शान्तिमय अस्तित्व का ‘जिओ और जीने दो’ का सिद्वात है। पर विवेकानन्द ने आक्रामक रूख अपनाया और दूसरों का विश्व धर्म का दावा रद्द करके अपना दावा पेश किया। यह आक्रामक रूख उन्होंने धर्म महासभा ही में अख्तयार कर लिया था और अख्तयार कर लेना आवश्यक तथा अनिवार्य भी था क्योंकि नव-जागरण की तरंग ने उन्हें ज़बरदस्ती वहां फेंका था और उन्हें धर्म के माध्यम से राजनीति की लड़ाई लड़नी थी। इस सिलसिले में उनका मस्तिष्क साफ था। वे स्वयं कहते हैं,