‘‘अगर तुम यूरोप और अमेरिका में उपदेश देने के लिए बारह सुशिक्षित दृढ़-चेता मनुष्यों को यहां भेज सको, और कुछ साल तक उन्हें रख सको, तो इस भांति राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से, दोनों तरह की भारत की अपरिमित सेवा हो जाए। प्रत्येक मनुष्य जो नैतिक दृष्टि से भारत के प्रति सहानुभूति है, वह राजनीतिक विषयों में भी उसका मित्र बन जाता है।’’ (वि. सा., चतुर्थ खंड, पृष्ठ 282)
इसी पत्र में उन्होंने अपने इस नये आविष्कार की चर्चा की थी कि
‘‘अगर तुम यूरोप और अमेरिका में उपदेश देने के लिए बारह सुशिक्षित दृढ़-चेता मनुष्यों को यहां भेज सको, और कुछ साल तक उन्हें रख सको, तो इस भांति राजनीतिक और नैतिक दृष्टि से, दोनों तरह की भारत की अपरिमित सेवा हो जाए। प्रत्येक मनुष्य जो नैतिक दृष्टि से भारत के प्रति सहानुभूति है, वह राजनीतिक विषयों में भी उसका मित्र बन जाता है।’’ (वि. सा., चतुर्थ खंड, पृष्ठ 282)
इसी पत्र में उन्होंने अपने इस नये आविष्कार की चर्चा की थी कि