द्वैत विशिष्टाद्वैत और अद्वैत-वेदान्त दर्शन की तीन अवस्थाएं हैं और ये अवस्थाएं एक के बाद एक क्रमशः आती है। इसलिए समग्र धर्म वेदान्त ही में आते हैं। यह समन्वय का सिद्वान्त है। इस पर वे पुस्तक भी लिखना चाहते थे, शायद लिख नहीं पाए। पर अपने इस नूतन आविष्कार के बाद उन्हें यह विश्वास अवश्य हो गया था कि वेदान्त ही देर-सवेर विश्व धर्म बनने जा रहा है और इसी पर भारत का और समूची मानव जाति का भविष्य निर्भर है और इसी से विश्व-बंधुत्व
द्वैत विशिष्टाद्वैत और अद्वैत-वेदान्त दर्शन की तीन अवस्थाएं हैं और ये अवस्थाएं एक के बाद एक क्रमशः आती है। इसलिए समग्र धर्म वेदान्त ही में आते हैं। यह समन्वय का सिद्वान्त है। इस पर वे पुस्तक भी लिखना चाहते थे, शायद लिख नहीं पाए। पर अपने इस नूतन आविष्कार के बाद उन्हें यह विश्वास अवश्य हो गया था कि वेदान्त ही देर-सवेर विश्व धर्म बनने जा रहा है और इसी पर भारत का और समूची मानव जाति का भविष्य निर्भर है और इसी से विश्व-बंधुत्व