के आधार पर (दूसरा कोई उपाय नहीं था) अखंड राष्ट्र एकता निर्माण करने का कार्य-भार विवेकानन्द ने अपने कंधों पर लिया और दक्षिण से उत्तर-रामनाड से अल्मोड़ा तक उन्होंने जो पताका फहराई उस पर वेदान्त का जनघोष ‘यत्र जीव तत्र शिव’ अंकित था। इस जनघोष की सैद्वांतिक व्याख्या उन्होंने यों की, ‘‘जब तुम अपने आपको शरीर समझते हो, तब तुम अनन्त अग्नि के एक स्फुलिंग हो, जब तुम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो, तभी तुम विश्व हो।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 213)
के आधार पर (दूसरा कोई उपाय नहीं था) अखंड राष्ट्र एकता निर्माण करने का कार्य-भार विवेकानन्द ने अपने कंधों पर लिया और दक्षिण से उत्तर-रामनाड से अल्मोड़ा तक उन्होंने जो पताका फहराई उस पर वेदान्त का जनघोष ‘यत्र जीव तत्र शिव’ अंकित था। इस जनघोष की सैद्वांतिक व्याख्या उन्होंने यों की, ‘‘जब तुम अपने आपको शरीर समझते हो, तब तुम अनन्त अग्नि के एक स्फुलिंग हो, जब तुम अपने आपको आत्मस्वरूप मानते हो, तभी तुम विश्व हो।’’ (दशम खंड, पृष्ठ 213)