योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand



अब वे देश की भूमि पर थे, विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कहीं, कहना उचित भी नहीं था, वे अब खुलकर कहीं। भ्रम-भ्रान्तियों को तोड़ने और कुसंस्कारों के जाले को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खड्ग का निर्भीकता

121 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

से प्रयोग किया। इसके बिना जन-साधारण के बीच फेले अंतर्विरोधों का निराकरण सम्भव नहीं था। अतएव ढाका में दिए गए ‘मैंने क्या सीखा’ भाषण में वे कहते हैं:

‘‘यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सभ्य देशों में घूम चुका हूं,


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अब वे देश की भूमि पर थे, विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कहीं, कहना उचित भी नहीं था, वे अब खुलकर कहीं। भ्रम-भ्रान्तियों को तोड़ने और कुसंस्कारों के जाले को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खड्ग का निर्भीकता

121 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द

से प्रयोग किया। इसके बिना जन-साधारण के बीच फेले अंतर्विरोधों का निराकरण सम्भव नहीं था। अतएव ढाका में दिए गए ‘मैंने क्या सीखा’ भाषण में वे कहते हैं:

‘‘यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सभ्य देशों में घूम चुका हूं,


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