अब वे देश की भूमि पर थे, विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कहीं, कहना उचित भी नहीं था, वे अब खुलकर कहीं। भ्रम-भ्रान्तियों को तोड़ने और कुसंस्कारों के जाले को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खड्ग का निर्भीकता
121 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
से प्रयोग किया। इसके बिना जन-साधारण के बीच फेले अंतर्विरोधों का निराकरण सम्भव नहीं था। अतएव ढाका में दिए गए ‘मैंने क्या सीखा’ भाषण में वे कहते हैं:
‘‘यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सभ्य देशों में घूम चुका हूं,
अब वे देश की भूमि पर थे, विदेश में जो बातें उन्होंने नहीं कहीं, कहना उचित भी नहीं था, वे अब खुलकर कहीं। भ्रम-भ्रान्तियों को तोड़ने और कुसंस्कारों के जाले को काटने के लिए उन्होंने आलोचना और आत्मालोचना की खड्ग का निर्भीकता
121 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
से प्रयोग किया। इसके बिना जन-साधारण के बीच फेले अंतर्विरोधों का निराकरण सम्भव नहीं था। अतएव ढाका में दिए गए ‘मैंने क्या सीखा’ भाषण में वे कहते हैं:
‘‘यद्यपि मैं पश्चिम के बहुत से सभ्य देशों में घूम चुका हूं,