विचार समाज का प्रतिबिम्ब है। जैसे-जैसे मनुष्य ने प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में आर्थिक और भौतिक उन्नति की है, वैसे-वैसे समाज और उसकी विभिन्न संस्थाओं का विकास हुआ है और उसके साथ ही विचार का भी विकास हुआ है। यों माक्र्स ने हेगल के द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में बदल दिया, यानी उसे पांव के बल सीधा खड़ा कर दिया।
अब देखिए, विवेकानन्द कहते हैं: ‘‘मेरे मत में बाह्म जगत् की एक सत्ता-हमारे मन के विचार
विचार समाज का प्रतिबिम्ब है। जैसे-जैसे मनुष्य ने प्रकृति के विरूद्व अपने संघर्ष में आर्थिक और भौतिक उन्नति की है, वैसे-वैसे समाज और उसकी विभिन्न संस्थाओं का विकास हुआ है और उसके साथ ही विचार का भी विकास हुआ है। यों माक्र्स ने हेगल के द्वन्द्वात्मक आदर्शवाद को द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद में बदल दिया, यानी उसे पांव के बल सीधा खड़ा कर दिया।
अब देखिए, विवेकानन्द कहते हैं: ‘‘मेरे मत में बाह्म जगत् की एक सत्ता-हमारे मन के विचार