के बाहर भी उसका एक अस्तित्व है। चैतन्य के क्रमविकास रूपी महान विधान का अनुवर्ती होकर यह सम्रग विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। चैतन्य का यह क्रमविकास जड़ के क्रमविकास जड़ के क्रमविकास से पृथक है। जड़ का क्रमविकास चैतन्य की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीत-स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में बद्व रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व नहीं प्राप्त कर सके।’’
और
के बाहर भी उसका एक अस्तित्व है। चैतन्य के क्रमविकास रूपी महान विधान का अनुवर्ती होकर यह सम्रग विश्व उन्नति के पथ पर अग्रसर हो रहा है। चैतन्य का यह क्रमविकास जड़ के क्रमविकास जड़ के क्रमविकास से पृथक है। जड़ का क्रमविकास चैतन्य की विकास प्रणाली का सूचक या प्रतीत-स्वरूप है, किन्तु उसके द्वारा इस प्रणाली की व्याख्या नहीं हो सकती। वर्तमान पार्थिव परिस्थिति में बद्व रहने के कारण हम अभी तक व्यक्तित्व नहीं प्राप्त कर सके।’’
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