19 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यहां तक कि सगत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व प्राप्ति के प्रति उपेक्षा। केवल रघुनाथ के उपदेश का पालन ही जीवन का एकमात्र व्रत। उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिए। ढोल, मृदंग, करताल बजाकर उछल-कूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है। एक तो यह पेट के रोगी मरीजों का दल और उस पर इतनी उछल-कूद! भला कैसे सहन होगी? कामविहीन उच्च साधना का अनुसरण न करके देश घोर तमोगुण से भर गया है। देश-देश में, गांव-गांव में-जहां भी जाओगे,
19 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
यहां तक कि सगत्व, ब्रह्मत्व, शिवत्व प्राप्ति के प्रति उपेक्षा। केवल रघुनाथ के उपदेश का पालन ही जीवन का एकमात्र व्रत। उसी प्रकार एकनिष्ठ होना चाहिए। ढोल, मृदंग, करताल बजाकर उछल-कूद मचाने से देश पतन के गर्त में जा रहा है। एक तो यह पेट के रोगी मरीजों का दल और उस पर इतनी उछल-कूद! भला कैसे सहन होगी? कामविहीन उच्च साधना का अनुसरण न करके देश घोर तमोगुण से भर गया है। देश-देश में, गांव-गांव में-जहां भी जाओगे,