मेरा तात्पर्य यह है कि पारस्परिक सहयोग के बिना हम लोग कभी शक्ति सम्पन्न नहीं हो सकते। इसीलिए मैं तुम लोगों को भिखमंगों की तरह नहीं, धर्माचार्य के रूप में इंग्लैंड जाने को कह रहा हूं। हमें अपने सामथ्र्य के अनुसार विनिमय का प्रयोग करना होगा। यदि हमें इस लोक में सुखी रहने के उपाय बताएं?’’ (वही, पृष्ठ 333-34)
जो लोग यूरोप की तरफ आंखें लगाए हुए थे और उसकी राजनीति यानी लोकतंत्र के प्रशंसक थे, उनसे विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘राजनीति से संबंधित यूरोप की संस्थाएं,
मेरा तात्पर्य यह है कि पारस्परिक सहयोग के बिना हम लोग कभी शक्ति सम्पन्न नहीं हो सकते। इसीलिए मैं तुम लोगों को भिखमंगों की तरह नहीं, धर्माचार्य के रूप में इंग्लैंड जाने को कह रहा हूं। हमें अपने सामथ्र्य के अनुसार विनिमय का प्रयोग करना होगा। यदि हमें इस लोक में सुखी रहने के उपाय बताएं?’’ (वही, पृष्ठ 333-34)
जो लोग यूरोप की तरफ आंखें लगाए हुए थे और उसकी राजनीति यानी लोकतंत्र के प्रशंसक थे, उनसे विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘राजनीति से संबंधित यूरोप की संस्थाएं,