प्रणालियां तथा और भी शासन पद्वति की अनेकानेक बातें समय-समय पर बिल्कुल व्यर्थ सिद्व होती रही है। और आज यूरोप की यह दशा है कि वह बेचैन है, यह नहीं जानता कि अब किस प्रणाली की शरण ले। वहां आर्थिक अत्याचार असह्म हो उठे हैं। देश का धन तथा शक्ति उन थोड़े से लोगों के हाथ में रख छोड़ी है, जो स्वयं तो कुछ काम करते नहीं, हां, सिर्फ लाखों मनुष्यों द्वारा काम चलाने की क्षमता ज़रूर रखते हैं। इस क्षमता द्वारा वे चाहें तो सारे संसार को
प्रणालियां तथा और भी शासन पद्वति की अनेकानेक बातें समय-समय पर बिल्कुल व्यर्थ सिद्व होती रही है। और आज यूरोप की यह दशा है कि वह बेचैन है, यह नहीं जानता कि अब किस प्रणाली की शरण ले। वहां आर्थिक अत्याचार असह्म हो उठे हैं। देश का धन तथा शक्ति उन थोड़े से लोगों के हाथ में रख छोड़ी है, जो स्वयं तो कुछ काम करते नहीं, हां, सिर्फ लाखों मनुष्यों द्वारा काम चलाने की क्षमता ज़रूर रखते हैं। इस क्षमता द्वारा वे चाहें तो सारे संसार को