योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

अपने प्रवास काल में उनसे बहुत कुछ सीखा। अपने उदार हृदय, विशाल अनुभव तथा तुलनात्मक अध्ययन से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि समूची मानव जाति का कल्याण पूर्व की आध्यात्मिकता और पश्चिम की भौतिकता के समन्वय सीखने-सिखाने और विचारों के आदान-प्रदान पर निर्भर है। अतएव अपने उक्त भाषण को जारी रखते हुए उन्होंने कहा:

‘‘पाश्चात्य देश तो असल में इन ‘शोयलाकों’ के बोझ तथा अत्याचार से जर्जर हो रहा है और इधर प्राच्य देश इन पुरोहितों के


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अपने प्रवास काल में उनसे बहुत कुछ सीखा। अपने उदार हृदय, विशाल अनुभव तथा तुलनात्मक अध्ययन से वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि समूची मानव जाति का कल्याण पूर्व की आध्यात्मिकता और पश्चिम की भौतिकता के समन्वय सीखने-सिखाने और विचारों के आदान-प्रदान पर निर्भर है। अतएव अपने उक्त भाषण को जारी रखते हुए उन्होंने कहा:

‘‘पाश्चात्य देश तो असल में इन ‘शोयलाकों’ के बोझ तथा अत्याचार से जर्जर हो रहा है और इधर प्राच्य देश इन पुरोहितों के


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