और कोई नहीं। भारतेतर भिन्न-भिन्न देशों से, समाज-सुधार के विषय के यहां जितने आते हैं, वे अधिकांश ऐसे
126 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
ही हैं। वहां के ज्ञानभिमानियों से कहो, ‘‘तुम जब अपने समाज का स्थायी संगठन कर सकोगे, तब तुम्हारी बात मानेंगे। तुम किसी भाव को दो दिन के लिए भी धारण नहीं कर सकते। विवाद करके उसे छोड़ देते हो। तुम वसंत काल में कीड़ों की तरह जन्म लेते हो और उन्हीं की तरह कुछ क्षण में मर जाते हो। बुलबुले की तरह
और कोई नहीं। भारतेतर भिन्न-भिन्न देशों से, समाज-सुधार के विषय के यहां जितने आते हैं, वे अधिकांश ऐसे
126 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
ही हैं। वहां के ज्ञानभिमानियों से कहो, ‘‘तुम जब अपने समाज का स्थायी संगठन कर सकोगे, तब तुम्हारी बात मानेंगे। तुम किसी भाव को दो दिन के लिए भी धारण नहीं कर सकते। विवाद करके उसे छोड़ देते हो। तुम वसंत काल में कीड़ों की तरह जन्म लेते हो और उन्हीं की तरह कुछ क्षण में मर जाते हो। बुलबुले की तरह