योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

तुम्हारी उत्पत्िा होती है और बुलबुले की भांति तुम्हारा नाश। पहले हमारे जैसा स्थायी समाज संगठित करो। पहले कुछ ऐसे सामाजिक नियामों और प्रथाओं को संचालित करो, जिनकी शक्ति हज़ारों वर्ष अक्षुण्ण रहे। किन्तु तब तक मेरे मित्र, तुम मात्र चंचल बालक हो।’’ (पंचम खंड, पृष्ठ 31-32)

‘मेरी क्रान्तिकारी योजना’ भाषण में वे कहते हैं:

‘‘हम लोगों को तोड़-मरोड़कर नये सिरों से दूसरे राष्ट्रों के ढांचे में गढ़ना असम्भव है। मैं दूसरी कौमों की


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तुम्हारी उत्पत्िा होती है और बुलबुले की भांति तुम्हारा नाश। पहले हमारे जैसा स्थायी समाज संगठित करो। पहले कुछ ऐसे सामाजिक नियामों और प्रथाओं को संचालित करो, जिनकी शक्ति हज़ारों वर्ष अक्षुण्ण रहे। किन्तु तब तक मेरे मित्र, तुम मात्र चंचल बालक हो।’’ (पंचम खंड, पृष्ठ 31-32)

‘मेरी क्रान्तिकारी योजना’ भाषण में वे कहते हैं:

‘‘हम लोगों को तोड़-मरोड़कर नये सिरों से दूसरे राष्ट्रों के ढांचे में गढ़ना असम्भव है। मैं दूसरी कौमों की


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