सामाजिक प्रथाओं की निन्दा नहीं करता। वे उनके लिए अच्छी हैं, पर हमारे लिए नहीं, उनके लिए जो कुछ अमृत है, हमारे लिए वही विष हो सकता है। पहले यही बात सीखनी होगी। अन्य प्रकार के विज्ञान, अन्य प्रकार के परम्परागत संस्कार और अन्य प्रकार के विचारों से उनकी वर्तमान प्रथा संगठित हुई है और हम लोगों के पीछे हैं, हमारे परम्परागत संस्कार और हज़ारों वर्षों के कर्म। अतएव हमें स्वभावतः अपने संस्कारों के अनुसार ही चलना पड़ेगा और यह हमें करना ही होगा।’’ (पृष्ठ 115)
सामाजिक प्रथाओं की निन्दा नहीं करता। वे उनके लिए अच्छी हैं, पर हमारे लिए नहीं, उनके लिए जो कुछ अमृत है, हमारे लिए वही विष हो सकता है। पहले यही बात सीखनी होगी। अन्य प्रकार के विज्ञान, अन्य प्रकार के परम्परागत संस्कार और अन्य प्रकार के विचारों से उनकी वर्तमान प्रथा संगठित हुई है और हम लोगों के पीछे हैं, हमारे परम्परागत संस्कार और हज़ारों वर्षों के कर्म। अतएव हमें स्वभावतः अपने संस्कारों के अनुसार ही चलना पड़ेगा और यह हमें करना ही होगा।’’ (पृष्ठ 115)