वर्ण की स्त्रियों को भी शिक्षा और स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित करके दासों में बदल दिया। इसे देश के पतन और अवनति का मुख्य कारण बताते हुए विवेकानन्द ने मई, 1894 में शिकागो से अपने एक पत्र में लिखा था:
‘‘परन्तु ईश्वर महान है। आगे या पीछे बदला मिलना ही था और जिन्होंने गरीबों को खून चूसा, जिनकी शिक्षा उनके धन से हुई, जिनकी शक्ति दरिद्रता पर बनी, वे अपनी बारी में हज़ारों और सैकड़ों की गिनती में दास बनाकर बेचे गए, उनकी सम्पत्िा
वर्ण की स्त्रियों को भी शिक्षा और स्वतंत्रता के अधिकारों से वंचित करके दासों में बदल दिया। इसे देश के पतन और अवनति का मुख्य कारण बताते हुए विवेकानन्द ने मई, 1894 में शिकागो से अपने एक पत्र में लिखा था:
‘‘परन्तु ईश्वर महान है। आगे या पीछे बदला मिलना ही था और जिन्होंने गरीबों को खून चूसा, जिनकी शिक्षा उनके धन से हुई, जिनकी शक्ति दरिद्रता पर बनी, वे अपनी बारी में हज़ारों और सैकड़ों की गिनती में दास बनाकर बेचे गए, उनकी सम्पत्िा