हज़ार वर्ष तक लुटती रही और उनकी स्त्रियां और कन्याएं अपमानित की गई। क्या आप समझते हैं कि यह अकारण ही हुआ?’’ (तृतीय खंड, पृष्ठ 326)
सवर्णों का एकाधिकार अब टूट चुका है। बीती बातों को लेकर चीखने-चिल्लाने और आपस में लड़ने-झगड़ने का कोई अर्थ नहीं। सवाल है कुचले हुओं को उठाने और शिक्षित करने का। बात तभी बनेगी, देश का भविष्य तभी संवरेगा और विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘जनता को उसकी बोल-चाल की भाषा में शिक्षा दो, उसको भाव दो बहुत कुछ जान जाएगी,
हज़ार वर्ष तक लुटती रही और उनकी स्त्रियां और कन्याएं अपमानित की गई। क्या आप समझते हैं कि यह अकारण ही हुआ?’’ (तृतीय खंड, पृष्ठ 326)
सवर्णों का एकाधिकार अब टूट चुका है। बीती बातों को लेकर चीखने-चिल्लाने और आपस में लड़ने-झगड़ने का कोई अर्थ नहीं। सवाल है कुचले हुओं को उठाने और शिक्षित करने का। बात तभी बनेगी, देश का भविष्य तभी संवरेगा और विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘जनता को उसकी बोल-चाल की भाषा में शिक्षा दो, उसको भाव दो बहुत कुछ जान जाएगी,