‘‘अतः ऐसा लगता है कि अंततः मतो-सम्प्रदायों का तिरोभाव न होकर उनकी वृद्वि ही तब तक होती जाएगी, जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए एक सम्प्रदाय नहीं बन जाता। और फिर समस्त एकता की पृष्ठीाूमि प्रस्तुत होगी। पुराण-गाथाओं और कर्मकांडों में कभी भी एकता न आ सकेगी, क्योंकि हम भावक्षेत्र की अपेक्षा वस्तुक्षेत्र में एक दूसरे से अधिक विभेद रखते हैं। एक ही सिद्वान्त को स्वीकार करते हुए भी लोग उसके आदर्श-उपदेष्टा की महत्ता के संबंध में मतभेद रखेंगे।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 274)
‘‘अतः ऐसा लगता है कि अंततः मतो-सम्प्रदायों का तिरोभाव न होकर उनकी वृद्वि ही तब तक होती जाएगी, जब तक प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए एक सम्प्रदाय नहीं बन जाता। और फिर समस्त एकता की पृष्ठीाूमि प्रस्तुत होगी। पुराण-गाथाओं और कर्मकांडों में कभी भी एकता न आ सकेगी, क्योंकि हम भावक्षेत्र की अपेक्षा वस्तुक्षेत्र में एक दूसरे से अधिक विभेद रखते हैं। एक ही सिद्वान्त को स्वीकार करते हुए भी लोग उसके आदर्श-उपदेष्टा की महत्ता के संबंध में मतभेद रखेंगे।’’ (नवम खंड, पृष्ठ 274)