अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां हैं। इस प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’ (प्रथम खंड, पृष्ठ 16)
अब देखना यह है कि धर्म का प्रारम्भ कैसे हुआ और वह क्रमशः विकास द्वारा आध्यात्मिक अद्वैतवाद की इस चरम सीमा तक कैसे पहुंचा? क्या इसके बाद विचार के विकास पर विराम चिहृ लगा देना सम्भव है?
मनुष्य मननशील प्राणी
अन्य सब आत्माएं जिसकी प्रतीयमान अभिव्यक्तियां हैं। इस प्रकार अनेकता और द्वैत में होते हुए इस परम अद्वैत की प्राप्ति होती है। धर्म इससे आगे नहीं जा सकता। यही समस्त विज्ञानों का चरम लक्ष्य है।’’ (प्रथम खंड, पृष्ठ 16)
अब देखना यह है कि धर्म का प्रारम्भ कैसे हुआ और वह क्रमशः विकास द्वारा आध्यात्मिक अद्वैतवाद की इस चरम सीमा तक कैसे पहुंचा? क्या इसके बाद विचार के विकास पर विराम चिहृ लगा देना सम्भव है?
मनुष्य मननशील प्राणी