है। उसका मस्तिष्क अन्य सभी प्राणियों की अपेक्षा अधिक उन्नत है और यह मस्तिष्क ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
जबकि दूसरे प्राणियों ने आत्मरक्षा की सहज प्रवृत्िा से अपने आपको प्रकृति के अनुरूप् ढाला है, वहां मनुष्य ने प्रकृति से विद्रोह करके उसे अपने अनुरूप ढाला है और निरन्तर ढालता चला जा रहा है। मनुष्य प्रकृति का दास नहीं, विजेता है। उसने अपनी विचार-शक्ति द्वारा आग, पानी, बिजली का प्रयोग करके, शस्त्र-यंत्र का आविष्कार करके
है। उसका मस्तिष्क अन्य सभी प्राणियों की अपेक्षा अधिक उन्नत है और यह मस्तिष्क ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
जबकि दूसरे प्राणियों ने आत्मरक्षा की सहज प्रवृत्िा से अपने आपको प्रकृति के अनुरूप् ढाला है, वहां मनुष्य ने प्रकृति से विद्रोह करके उसे अपने अनुरूप ढाला है और निरन्तर ढालता चला जा रहा है। मनुष्य प्रकृति का दास नहीं, विजेता है। उसने अपनी विचार-शक्ति द्वारा आग, पानी, बिजली का प्रयोग करके, शस्त्र-यंत्र का आविष्कार करके