उनके असार तत्व को त्यागकर सारतत्व को भौतिक शक्ति में परिणत किया तथा सिद्वान्तांे का रूप दिया। यों क्रमशः ज्ञान का-साहित्य, कला, संस्कृति तथा धर्म का विकास हुआ। विवेकानन्द अपने ‘माया और ईश्वर-धारणा का क्रम विकास’ भाषण में कहते हैं:
‘‘संसार के सभी धर्मों ने इस प्रश्न को उठाया है-संसार में यह असामंजस्य क्यों है? संसार में यह अशुभ क्यों है? आदिम धर्म भाव के आविर्भाव के समय हम इस प्रश्न को उठते नहीं देखते। इसका कारण यह है
उनके असार तत्व को त्यागकर सारतत्व को भौतिक शक्ति में परिणत किया तथा सिद्वान्तांे का रूप दिया। यों क्रमशः ज्ञान का-साहित्य, कला, संस्कृति तथा धर्म का विकास हुआ। विवेकानन्द अपने ‘माया और ईश्वर-धारणा का क्रम विकास’ भाषण में कहते हैं:
‘‘संसार के सभी धर्मों ने इस प्रश्न को उठाया है-संसार में यह असामंजस्य क्यों है? संसार में यह अशुभ क्यों है? आदिम धर्म भाव के आविर्भाव के समय हम इस प्रश्न को उठते नहीं देखते। इसका कारण यह है