कि आदिम मनुष्य को जगत् असामंजस्यपूर्ण नहीं लगा। उसके चारों और कोई असांमजस्य नहीं था, किसी प्रकार का मत विरोध नहीं था, भले-बुरे की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। उसके हृदय में केवल दो बातों का संग्राम हो रहा था। एक कहती थी-यह करो, और दूसरी उसे कने का निषेध करती थी। आदिमानव भावनाओं का दास था, उसके मन में जो आता था, वही शरीर से कर डालता था। वह इन भावनाओं के संबंध में विचार करने अथवा उनका संयम करने का बिल्कुल प्रयत्न नहीं करता था। देवताओं के संबंध में यही बात है,
कि आदिम मनुष्य को जगत् असामंजस्यपूर्ण नहीं लगा। उसके चारों और कोई असांमजस्य नहीं था, किसी प्रकार का मत विरोध नहीं था, भले-बुरे की कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं थी। उसके हृदय में केवल दो बातों का संग्राम हो रहा था। एक कहती थी-यह करो, और दूसरी उसे कने का निषेध करती थी। आदिमानव भावनाओं का दास था, उसके मन में जो आता था, वही शरीर से कर डालता था। वह इन भावनाओं के संबंध में विचार करने अथवा उनका संयम करने का बिल्कुल प्रयत्न नहीं करता था। देवताओं के संबंध में यही बात है,