योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

ये लोग भी अपनी भावनाओं के अधीन थे। इंद्र आया और उसने असुर बल को छिन्न-भिन्न कर दिया। जिहोवा किसी के प्रति सन्तुष्ट था, तो किसी से रूष्ट, क्यों? यह कोई भी नहीं जानता, जानना भी नहीं चाहता। इसका कारण यह है कि उस समय लोगों में अनुसंधान की प्रवृत्िा ही नहीं थी, इसलिए वे जो कुछ भी करते, वही ठीक था। उस समय बुरे-भले की कोई धारणा नहीं थी, हम वेदों में देखते हैं कि इंद्र और अन्यान्य देवताओं ने अनेक बुरे कार्य किए हैं, पर इंद्र


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ये लोग भी अपनी भावनाओं के अधीन थे। इंद्र आया और उसने असुर बल को छिन्न-भिन्न कर दिया। जिहोवा किसी के प्रति सन्तुष्ट था, तो किसी से रूष्ट, क्यों? यह कोई भी नहीं जानता, जानना भी नहीं चाहता। इसका कारण यह है कि उस समय लोगों में अनुसंधान की प्रवृत्िा ही नहीं थी, इसलिए वे जो कुछ भी करते, वही ठीक था। उस समय बुरे-भले की कोई धारणा नहीं थी, हम वेदों में देखते हैं कि इंद्र और अन्यान्य देवताओं ने अनेक बुरे कार्य किए हैं, पर इंद्र


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