के उपासकों की दृष्टि में बुरा काम कुछ भी नहीं था, अतः वे इस संबंध में कोई प्रश्न नहीं करते।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 63)
स्पष्ट है कि आदिम युग का मानव प्रकृति की भंयकर शक्तियों के विरूद्व जूझ रहा था। वह उन्हें समझने में असमर्थ था, लेकिन इसके बावजुद प्रकृति को बदलने और उसको अपने वश में करने का संकल्प मन में लिये हुए था। उस समय उसकी प्रमुख समस्या अपने अस्तित्व को बनाए रखना था, शिकार और फल जो भी मिल जाए उसी पर रहता था। वह
के उपासकों की दृष्टि में बुरा काम कुछ भी नहीं था, अतः वे इस संबंध में कोई प्रश्न नहीं करते।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 63)
स्पष्ट है कि आदिम युग का मानव प्रकृति की भंयकर शक्तियों के विरूद्व जूझ रहा था। वह उन्हें समझने में असमर्थ था, लेकिन इसके बावजुद प्रकृति को बदलने और उसको अपने वश में करने का संकल्प मन में लिये हुए था। उस समय उसकी प्रमुख समस्या अपने अस्तित्व को बनाए रखना था, शिकार और फल जो भी मिल जाए उसी पर रहता था। वह