और इंद्र अपने वज्र द्वारा उसके लिए पहाड़ तोड़ता और अुसर-बल को छिन्न-भिन्न करता है। वैदिक काल का मनुष्य निपट भौतिकवादी है। वह भी इसी धरती पर है और उसके देवता भी धरती पर है। इससे परे किसी स्वर्ग-नरक आत्मा-परमात्मा का कोई भाव या विचार उसके मन में नहीं । मृत्यु का भय और अमरत्व की इच्छा भी उसे नहीं सताती। जैसा वह खुद सीधा-साधा है, वैसे ही उसकी उपासन-प्रार्थना भी सीधी-सादी है। सुनिए:
जीवेम् शदः शतं, श्रुणुयाम शरदः शतं
प्रब्वाम शरदः शतं, अदीना स्याम शरदः शतं
और इंद्र अपने वज्र द्वारा उसके लिए पहाड़ तोड़ता और अुसर-बल को छिन्न-भिन्न करता है। वैदिक काल का मनुष्य निपट भौतिकवादी है। वह भी इसी धरती पर है और उसके देवता भी धरती पर है। इससे परे किसी स्वर्ग-नरक आत्मा-परमात्मा का कोई भाव या विचार उसके मन में नहीं । मृत्यु का भय और अमरत्व की इच्छा भी उसे नहीं सताती। जैसा वह खुद सीधा-साधा है, वैसे ही उसकी उपासन-प्रार्थना भी सीधी-सादी है। सुनिए:
जीवेम् शदः शतं, श्रुणुयाम शरदः शतं
प्रब्वाम शरदः शतं, अदीना स्याम शरदः शतं