भूयश्च शरदा शतात।
अर्थात् मैं सौ वर्ष तक जिऊ, सौ वष्र तक सुनूं, सौ वर्ष तक बोलूं और मैं सौ वर्ष तक दीनता-रहित होकर जिऊं।
फिर आकाश में घन-घटाआंे को देखकर वह कह उठता है:
काले वर्षतु परजन्यो, पृथ्वी शस्य शलिनि।
देशोयम् क्षोभरहितो, मानवा सन्तनिर्भय।
अर्थात्, मेह समय पर बरसे, धरती फसलों से भरपुर हो, यह देश क्षोभ से रहित हो और सारे मानव निर्भय हों।
यजुर्वेद का जो राष्ट्र गान है, उसका भावार्थ यह है कि मनुष्य शस्त्र
भूयश्च शरदा शतात।
अर्थात् मैं सौ वर्ष तक जिऊ, सौ वष्र तक सुनूं, सौ वर्ष तक बोलूं और मैं सौ वर्ष तक दीनता-रहित होकर जिऊं।
फिर आकाश में घन-घटाआंे को देखकर वह कह उठता है:
काले वर्षतु परजन्यो, पृथ्वी शस्य शलिनि।
देशोयम् क्षोभरहितो, मानवा सन्तनिर्भय।
अर्थात्, मेह समय पर बरसे, धरती फसलों से भरपुर हो, यह देश क्षोभ से रहित हो और सारे मानव निर्भय हों।
यजुर्वेद का जो राष्ट्र गान है, उसका भावार्थ यह है कि मनुष्य शस्त्र