प्रश्न को दबा देने की सारी चेष्टाएं विफल रहेंगी।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 3)
विवेकानन्द ने आत्मा-परमात्मा विषयक जितने भी उदाहरण दिए हैं, उपनिषदों तथा गीता से दिए हैं और वे उपनिषदों को भी वेद कहते हैं। वेदान्त दर्शन की सैद्वान्तिक व्याख्या करते हुए उन्होंने धर्म को कर्मकांड और ज्ञानकांड में विभाजित कर लिया है। 1 जून, 1897 को वे अल्मोड़ा से अपने किसी शिष्य के नाम पत्र
134 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
में लिखते हैं:
‘‘वेदों के विरूद्व तुमने जो तर्क किया है,
प्रश्न को दबा देने की सारी चेष्टाएं विफल रहेंगी।’’ (द्वितीय खंड, पृष्ठ 3)
विवेकानन्द ने आत्मा-परमात्मा विषयक जितने भी उदाहरण दिए हैं, उपनिषदों तथा गीता से दिए हैं और वे उपनिषदों को भी वेद कहते हैं। वेदान्त दर्शन की सैद्वान्तिक व्याख्या करते हुए उन्होंने धर्म को कर्मकांड और ज्ञानकांड में विभाजित कर लिया है। 1 जून, 1897 को वे अल्मोड़ा से अपने किसी शिष्य के नाम पत्र
134 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
में लिखते हैं:
‘‘वेदों के विरूद्व तुमने जो तर्क किया है,