योद्धा सन्यासी विवेकानंद - Yoddha Sanyasi Vivekanand

वह अखंडनीय होता, यदि ‘वेद’ शब्द का अर्थ संहिता होता। भारत में यह सर्वसम्मत है कि ‘वेद’ शब्द में तीन भाग सम्मिलित हैं-संहिता, ब्राह्मण और उपनिषद्। इनमें से पहले दो भाग कर्मकांड संबंधी होने के कारण अब लगभग एक ओर रख दिए गए हैं। सब मतों के निर्माताओं तथा तत्वज्ञानियों ने केवल उपनिषदों को ही ग्रहण किया है।

‘‘केवल संहिता ही वेद हैं, यह स्वामी दयानन्द का शुरू किया हुआ बिल्कुल नया विचार है, और पुरातन मतावलम्बी या सनातनी जनता में इसको मानने वाला कोई नहीं है।’’


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वह अखंडनीय होता, यदि ‘वेद’ शब्द का अर्थ संहिता होता। भारत में यह सर्वसम्मत है कि ‘वेद’ शब्द में तीन भाग सम्मिलित हैं-संहिता, ब्राह्मण और उपनिषद्। इनमें से पहले दो भाग कर्मकांड संबंधी होने के कारण अब लगभग एक ओर रख दिए गए हैं। सब मतों के निर्माताओं तथा तत्वज्ञानियों ने केवल उपनिषदों को ही ग्रहण किया है।

‘‘केवल संहिता ही वेद हैं, यह स्वामी दयानन्द का शुरू किया हुआ बिल्कुल नया विचार है, और पुरातन मतावलम्बी या सनातनी जनता में इसको मानने वाला कोई नहीं है।’’


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