‘‘इस नये मत के पीछे कारण यह था कि स्वामी दयानन्द यह समझते थे कि संहिता की एक नई व्याख्या के अनुसार वे पूरे वेद का एक सुसंगत सिद्वान्त निर्माण कर सकेंगे। परन्तु कठिनाइयां ज्यों की त्यों बनी रहीं, केवल वे अब ब्राह्मण भाग कें संबंध में उठ खड़ी हुई और अनेक व्याख्याओं तथा प्रक्षिप्तता की परिकल्पनाओं के बावजुद बहुत कुछ शेष रह गई।’’ (षष्टम खंड, पृष्ठ 327)
डनके नज़दीक वेद ‘संहिता’ और उपनिषद् की बात ही प्रमाण है। अपने मद्रास के भाषण में वे कहते हैं:
‘‘इस नये मत के पीछे कारण यह था कि स्वामी दयानन्द यह समझते थे कि संहिता की एक नई व्याख्या के अनुसार वे पूरे वेद का एक सुसंगत सिद्वान्त निर्माण कर सकेंगे। परन्तु कठिनाइयां ज्यों की त्यों बनी रहीं, केवल वे अब ब्राह्मण भाग कें संबंध में उठ खड़ी हुई और अनेक व्याख्याओं तथा प्रक्षिप्तता की परिकल्पनाओं के बावजुद बहुत कुछ शेष रह गई।’’ (षष्टम खंड, पृष्ठ 327)
डनके नज़दीक वेद ‘संहिता’ और उपनिषद् की बात ही प्रमाण है। अपने मद्रास के भाषण में वे कहते हैं: