है या सब यहीं समाप्त हो जाता है और क्या इस प्रत्यक्ष संसार के परे भी कुछ है। उपनिषदों में भी आत्मा संबंधी नचिकेता, सत्यकाम, जडभरत तथा इंद्र और विरोचन आदि की जो कथाएं हैं, वे एक तो बहुत अटपटी और अनुत्कृष्ट हैं और दूसरे, उनमें आत्मा शब्द की चर्चा ही चर्चा है, कोई निश्चित धारणा नहीं। यह धारणा गीता में प्रतिपादित हुई है और बाद में शंकराचार्य, रामानुज, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द इत्यादि वेदान्तियों ने उसे आगे विकसित किया है।
है या सब यहीं समाप्त हो जाता है और क्या इस प्रत्यक्ष संसार के परे भी कुछ है। उपनिषदों में भी आत्मा संबंधी नचिकेता, सत्यकाम, जडभरत तथा इंद्र और विरोचन आदि की जो कथाएं हैं, वे एक तो बहुत अटपटी और अनुत्कृष्ट हैं और दूसरे, उनमें आत्मा शब्द की चर्चा ही चर्चा है, कोई निश्चित धारणा नहीं। यह धारणा गीता में प्रतिपादित हुई है और बाद में शंकराचार्य, रामानुज, रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द इत्यादि वेदान्तियों ने उसे आगे विकसित किया है।