विभाजित होना अनिवार्य था। अतएव विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘हमारे भीतर एक प्रकार की प्रवृत्िायां हैं, जो इंद्रियों के द्वारा बाहर जाने की चेष्टा करती रहती हैं और उनके पीछे, चाहे कितना ही क्षीण क्यों न हो, एक स्वर
136 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कहता रहता है-बाहर मत जाना। इन दो बातों के संस्कृत नाम हैं-प्रवृत्ि और निवृत्िा ही हमारे समस्त कर्माें का मूल है, निवृत्िा से धर्म का आरम्भ होता है। जहां यह ‘मत करना’ नहीं है, वहां
विभाजित होना अनिवार्य था। अतएव विवेकानन्द कहते हैं:
‘‘हमारे भीतर एक प्रकार की प्रवृत्िायां हैं, जो इंद्रियों के द्वारा बाहर जाने की चेष्टा करती रहती हैं और उनके पीछे, चाहे कितना ही क्षीण क्यों न हो, एक स्वर
136 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
कहता रहता है-बाहर मत जाना। इन दो बातों के संस्कृत नाम हैं-प्रवृत्ि और निवृत्िा ही हमारे समस्त कर्माें का मूल है, निवृत्िा से धर्म का आरम्भ होता है। जहां यह ‘मत करना’ नहीं है, वहां