137 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जीवन जी रहे थे, आत्मज्ञान की उपलब्धि तथा मोक्ष ही उनकी महत्वाकांक्षा थी, जो दिन-दिन अंतमुर्खी होते जा रहे थे, और जिनके लिए और अनेक पहेलियों की अपेक्षा स्वयं मनुष्य ही सबसे पेचिदा पहेली बन गया था। भौतिकवादियों ने उनसे डटकर लोहा लिया। लोहा लेने वालांे में एक बहुत ही सशक्त परम्परा चार्वाकों की है। उनका दर्शन इतना लोकप्रिय था वह ‘लोकायत’ यानी जनसाधारण की विचारधारा के नाम से प्रसिद्व है।
137 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
जीवन जी रहे थे, आत्मज्ञान की उपलब्धि तथा मोक्ष ही उनकी महत्वाकांक्षा थी, जो दिन-दिन अंतमुर्खी होते जा रहे थे, और जिनके लिए और अनेक पहेलियों की अपेक्षा स्वयं मनुष्य ही सबसे पेचिदा पहेली बन गया था। भौतिकवादियों ने उनसे डटकर लोहा लिया। लोहा लेने वालांे में एक बहुत ही सशक्त परम्परा चार्वाकों की है। उनका दर्शन इतना लोकप्रिय था वह ‘लोकायत’ यानी जनसाधारण की विचारधारा के नाम से प्रसिद्व है।