मतलब यह है कि चार्वाक श्रमजीवी जनसाधारण के प्रतिनिधि थे। सारांश यह कि आदर्शवाद निवृत्िा अर्थात् ‘न करो’ का और भौतिकवाद प्रवृत्िा अर्थात् ‘करो- का सिद्वान्त है। विवेकानन्द लिखते हैं:
‘‘चार्वाकों ने बड़े भयानक मतों का प्रचार किया, जैसा कि आज उन्नीसवीं शताब्दी में भी लोग इस प्रकार खुल्लमखुल्ला मंदिरों और नगरों में प्रचार करने दिया गया कि धर्म मिथ्या है, वह केवल पुरोहितों की स्वार्थपूर्ति का एक उपाय है, वेद कवेल पाखंडी, धूर्त,
मतलब यह है कि चार्वाक श्रमजीवी जनसाधारण के प्रतिनिधि थे। सारांश यह कि आदर्शवाद निवृत्िा अर्थात् ‘न करो’ का और भौतिकवाद प्रवृत्िा अर्थात् ‘करो- का सिद्वान्त है। विवेकानन्द लिखते हैं:
‘‘चार्वाकों ने बड़े भयानक मतों का प्रचार किया, जैसा कि आज उन्नीसवीं शताब्दी में भी लोग इस प्रकार खुल्लमखुल्ला मंदिरों और नगरों में प्रचार करने दिया गया कि धर्म मिथ्या है, वह केवल पुरोहितों की स्वार्थपूर्ति का एक उपाय है, वेद कवेल पाखंडी, धूर्त,