निशाचरों की रचना है, न कोई ईश्वर है-न आत्मा । यदि आत्मा है, तो वह स्त्री-पुरूष आदि के प्रेम के आकृष्ट होकर लौट क्यों नहीं आती? इन लोगों की यह धारणा थी कि यदि आत्मा होती, तो मृत्यु के बाद भी उसमें प्रेम आदि की भावनाएं रहती और वह अच्छा खाना और अच्छा पहनना चाहती। ऐसा होने पर भी चार्वाकों को किसी ने सताया नहीं।’’ (वही, पृष्ठ 69)
इसके विपरीत महाभारत में यह कथा आती है कि पाण्डव जब कुरूक्षेत्र से विजयी होकर लौटे तो हस्तिनापुर के दरवाजे़ पर चार्वाक ने युधिष्ठिर से कहा,
निशाचरों की रचना है, न कोई ईश्वर है-न आत्मा । यदि आत्मा है, तो वह स्त्री-पुरूष आदि के प्रेम के आकृष्ट होकर लौट क्यों नहीं आती? इन लोगों की यह धारणा थी कि यदि आत्मा होती, तो मृत्यु के बाद भी उसमें प्रेम आदि की भावनाएं रहती और वह अच्छा खाना और अच्छा पहनना चाहती। ऐसा होने पर भी चार्वाकों को किसी ने सताया नहीं।’’ (वही, पृष्ठ 69)
इसके विपरीत महाभारत में यह कथा आती है कि पाण्डव जब कुरूक्षेत्र से विजयी होकर लौटे तो हस्तिनापुर के दरवाजे़ पर चार्वाक ने युधिष्ठिर से कहा,