ये चाहे चोरी करके अथवा कर्ज़ लेकर ‘घी पियो’ इत्यादि उक्तियां उनसे जोड़ी गई और उन्हें
137 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पाशवी प्रकृति वाले मनुष्य बताया गया, जिनका सुख-भोग इंद्रियों में आबद्व रहता है। हालांकि इंद्रियों का सुख भोग भी सम्पत्िा की स्वामियों ही को यमस्सर था, श्रमजीवी साधारण जनता तो उससे एकदम वंचित थे।
अध्यात्मवादियों ने चार्वाक् का तो खंडन किया,लेकिन कपिल के सांख्य दर्शन में प्रवेश करने का उन्हें चोर-दरवाज़ा
ये चाहे चोरी करके अथवा कर्ज़ लेकर ‘घी पियो’ इत्यादि उक्तियां उनसे जोड़ी गई और उन्हें
137 योद्धा संन्यासी विवेकानन्द
पाशवी प्रकृति वाले मनुष्य बताया गया, जिनका सुख-भोग इंद्रियों में आबद्व रहता है। हालांकि इंद्रियों का सुख भोग भी सम्पत्िा की स्वामियों ही को यमस्सर था, श्रमजीवी साधारण जनता तो उससे एकदम वंचित थे।
अध्यात्मवादियों ने चार्वाक् का तो खंडन किया,लेकिन कपिल के सांख्य दर्शन में प्रवेश करने का उन्हें चोर-दरवाज़ा